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UP पुलिस में नई व्यवस्था: अब एडिशनल एसपी और DSP के पेशकार होंगे इंस्पेक्टर, खीरी जिले में की गई तैनाती; DGP के आदेश से इंस्पेक्टरों में मची खलबली

Punjab

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वाराणसीएक घंटा पहले

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उत्तर प्रदेश के DGP मुकुल गोयल ने पुलिस महकमे में एक नई व्यवस्था बनाई है। अब एडिशनल एसपी (Addl. SP) और पुलिस उपाधीक्षक (DSP) के पेशकार (रीडर) होंगे। इस आधार पर प्रदेश में खीरी जिले में 1984 से लेकर 2012 बैच तक के 8 इंस्पेक्टर को एडिशनल एसपी और डीएसपी का पेशकार तैनात भी कर दिया गया है। अब तक तक एडिशनल एसपी के पेशकार सब इंस्पेक्टर और पुलिस उपाधीक्षक के पेशकार हेड कांस्टेबल होते थे।

वहीं, इंस्पेक्टर अब तक पुलिस अधीक्षक (SP) या उनसे उच्च स्तर के अधिकारियों के पेशकार के तौर पर तैनात होते थे। DGP के नए फरमान से प्रदेश के इंस्पेक्टरों में खलबली मची हुई है।

DGP का क्या है फरमान

उत्तर प्रदेश के जिलों के लिए इंस्पेक्टर के स्वीकृत 3,642 पदों में से मौजूदा समय में 3,057 इस समय थानों और कार्यालयों में तैनात हैं। इस तरह से प्रदेश के सभी जिलों में अधिक संख्या में इंस्पेक्टर तैनात हैं। इनमें से जो इंस्पेक्टर 58 साल की आयु पूरी कर चुके हैं उन्हें थाना प्रभारी के पद पर नीतिगत आधार पर तैनात नहीं किया जा सकता है। 58 वर्ष से कम आयु के भी प्रत्येक जिले में ऐसे कई इंस्पेक्टर हैं जिनका सदुपयोग नहीं हो पा रहा है।

DGP का कहना है कि योग्य, कार्यकुशल, अनुभवी, कर्मठ, ईमानदार, दक्ष और स्वस्थ इंस्पेक्टर का सदुपयोग किया जाना विभागीय हित में होगा।

आम जनता की समस्याएं सुलझेंगी

DGP ने कहा है कि अपर पुलिस अधीक्षक या पुलिस उपाधीक्षक सरकारी काम से कार्यालय या मुख्यालय से बाहर रहते हैं तो उनकी अनुपस्थिति में आमजन की समस्याएं सुनने के लिए कोई उच्च स्तर का अधिकारी नहीं रहता है। इससे आम जनता को दिक्कत होती है और उन्हें अधिकारी से मिलने के लिए बार-बार उनके कार्यालय आना पड़ता है।

इसके अलावा अपर पुलिस अधीक्षक और पुलिस उपाधीक्षक कार्यालय के अभिलेख, अपराध रजिस्टर, एसआर पत्रावली आदि का रखरखाव का जैसा स्तर होना चाहिए, वैसा नहीं हो पा रहा है। इसलिए जिलों में थाना प्रभारी के पद पर नियुक्त होने के बाद जो अतिरिक्त इंस्पेक्टर बचते हैं या जो इंस्पेक्टर 58 साल की आयु पूरी कर चुके हैं, उनसे अपर पुलिस अधीक्षक और पुलिस उपाधीक्षक कार्यालय में पेशकार का काम लिया जाए।

सोशल मीडिया पर नाराजगी जाहिर कर रहे इंस्पेक्टर

DGP के नए फरमान से इंस्पेक्टरों में नाराजगी है। एक अनुशासित बल का कर्मचारी होने के कारण वह खुल कर तो कुछ नहीं कह पा रहे हैं लेकिन सोशल मीडिया पर मैसेज के सहारे अपनी भड़ास निकाल रहे हैं। उनका कहना है कि यह सही निर्णय नहीं है। इसके साथ ही इंस्पेक्टरों द्वारा सोशल मीडिया पर एक-दूसरे को भेजा जा रहा मैसेज इन दिनों जमकर वायरल है।

सोशल मीडिया पर यह मैसेज वायरल

  • महोदय, पुलिस अधीक्षक खीरी का निरीक्षकों को क्षेत्राधिकारी कार्यालय में रीडर नियुक्त करने का आदेश सोशल मीडिया पर देखा तो इसके बारे में कुछ लिखने का विचार आया।
  • यह आदेश पूर्णरूपेण अवैध है। पुलिस रेगुलेशन एक्ट और पुलिस अधिनियम में किसी सक्षम अधिकारी ने ऐसा नियम अभी तक नहीं बनाया है।
  • पुलिस अधिनियम की धारा 2 से भर्ती, धारा 8 से प्रमाण मिलते ही कोई व्यक्ति, पुलिस अधिकारी की शक्ति, कृत्य, विशेषाधिकार प्राप्त माना जाता है और धारा 20/23 के अनुसार वह इस अधिनियम, दंड प्रक्रिया संहिता, पुलिस रेगुलेशन एक्ट के अनुसार सक्षम प्राधिकारी का विधिपूर्णतः आदेश मानने के लिए ही बाध्य है, अवैध आदेश बाध्यकारी नहीं है।
  • पुलिस रेगुलेशन एक्ट में 40-43 तक सर्किल आफिसर के कार्य बताए गए हैं, जिसके बारे में शासन ने एक जनसूचना में बताया है कि वर्तमान मे यह पद नहीं है। इन कार्यों का निर्वहन क्षेत्राधिकार के द्वारा किया जाता है।
  • पुलिस रेगुलेशन में 43-50 में थानाध्यक्ष एवं सिविल पुलिस उपनिरीक्षक के कार्य बताए गए हैं। इसी में वर्तमान निरीक्षक के भी कार्य और अधिकार समाहित हैं। यह भी शासन ने माना है और इसमें कोई बदलाव नहीं हुआ है।
  • पुलिस अधिनियम में धारा 12 में महानिरीक्षक को नियम बनाने के अधिकार हैं, जो वर्तमान में महानिदेशक में समाहित हैं। यदि महानिदेशक ऐसा नियम बनाएं तो कुछ विचारणीय होता। यद्यपि कि वह भी विधिक त्रुटिपूर्ण माना जाता।
  • जनपदीय पुलिस के 58+ निरीक्षक, उप निरीक्षक को थानों का चार्ज न देने के लिए कई बार आदेश हुए हैं। कर्मठ कर्मचारियों के लिए यह आदेश शिथिल भी किए गए हैं।
  • थानों का चार्ज न देने का अर्थ यह नहीं है कि उन्हें जहां नियतन नहीं है, वहां नियुक्त कर दिया जाए।
  • नियतन से अधिक को गैर जनपदों अथवा अजनपदीय शाखाओं में स्थानांतरित करने के लिए अधिकारी लिख सकते हैं।
  • क्षेत्राधिकारी कार्यालय में निरीक्षक की कोई स्वीकृति नहीं है। सिविल पुलिस का उपनिरीक्षक/निरीक्षक, जांच, अन्वेषण, कानून और व्यवस्था की ड्यूटी के लिए भर्ती हुआ है। लिपिकीय कार्य के लिए मिनिस्ट्रीयल स्टाफ होता है।
  • पुलिस उपाधीक्षक और निरीक्षक समान वेतन के अधिकारी हैं। यह शासन ने जनसूचना में भी स्वीकारा है और वेतन आयोग से सत्य भी है। दोनों अधिकारी का समान वेतनमान 93100-34800, ग्रेड-पे 5400 रुपए है। ऐसे में समान वेतनमान का एक अधिकारी दूसरे अधिकारी के अधीनस्थ कार्यालयीय लिपिक के रूप में कैसे नियुक्त किया जा सकता है। केवल पर्यवेक्षणीय अधीनस्थ तक ही सीमित रह सकता है।
  • ऐसे आदेश निरीक्षक पद को अपमानित करने वाला समझा जाएगा। भविष्य में असंतुष्ट कोई अधिकारी समान वेतनधारी का गनर या फोन ड्यूटी के लिए भी किसी अधिकारी को लगा सकते हैं।
  • इस आदेश का पालन निरीक्षकों को नहीं करना चाहिए क्योंकि यह अवैध एवं नियमों में नहीं है।
  • पुलिस अधीक्षक खीरी के आदेश एवं उनकी ऐसी मानसिक सोच की घोर निंदा की जानी चाहिए।
  • जो योग्य सदस्य सोशल मीडिया से जुडे हों उनसे विशेष आग्रह है कि वे इसका अधिक से अधिक प्रचार सोशल मीडिया पर करें। जिससे अनुशासन में बंधे निरीक्षकों की बात शासन एवं महानिदेशक, पत्रकारों तक शीघ्र पहुंच जाए। ताकि भविष्य में ऐसे आदेश दूसरे अधिकारी न करें। सभी को प्रणाम एवं धन्यवाद…।

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