Wednesday, June 16, 2021

Winning life in the battle of breaths; 16 life lines seen moving together on screen | सांसों की लड़ाई में जिंदगी जीत रही; स्क्रीन पर एक साथ चलती दिखी 16 लाइफ लाइन

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Newsline रिपोर्टर संदीप शर्मा ने 11 घंटे तक एसएमएस आरयूएचएस आईसीयू में देखा डर को हारते हुए।

कोरोना…डर के लिए बस नाम ही काफी है। जिंदगी की जद्दोजहद और मौत को हराने की जिद ही इस बीमारी का अचूक मंत्र है। इस मोर्चे पर जो दोहरी लड़ाई लड़ रहे हैं वो हैं..डॉक्टर्स-नर्स फिर हैल्थ वर्कर। खुद को बचाने की चुनौती और मरीज को जिंदगी देने का संघर्ष इस धरती के ईश्वर को संजीवनी दे रहा है।

पूरा देश आज ‘इन सफेद कोट’ वाले देवदूतों पर ही तो भरोसा कर रहा है। ये लोग कैसे इस डर के माहौल में खुद में जीत की जिद बनाए हुए हैं…मरीजों का डॉक्टर के प्रति और डॉक्टरों का मरीजों के प्रति व्यवहार…जिंदगी के प्रति बदला नजरिया और अस्पतालों के पूरे माहौल को देखने के लिए Newsline एसएमएस और आरयूएचएस के आईसीयू तक पहुंचा।

शनिवार, सुबह 9 बजे…एसएमएस आईसीयू

आईसीयू में दाखिल होते ही मुझे सुकून भरी तस्वीर दिखी…डॉक्टर्स से लेकर नर्सिंग कर्मियों तक जितने भी फ्रंट लाइन वॉरियर्स वहां थे हर कोई बिना पीपीई किट का दिखा। हां, सबने डबल मॉस्क और फेस शील्ड जरूर लगा रखा था। मैंने हैरानी से पूछा तो डॉक्टर्स ने बताया कि हम सब ने वैक्सीन की शील्ड ले रखी है इसलिए निश्चिंतता है।

इसी दौरान मैं एक-एक सांस के लिए लड़ रहे उन मरीजों के बारे में सोच रहा था कि एनेस्थीसिया की प्रोफेसर डॉ. रीमा मीणा की आवाज से ध्यान टूटा। उन्होेंने मुझे पीपीई किट दिया और बोला पहले इसे पहनिए। आईसीयू में 22 मरीज भर्ती थे और सभी एक-एक सांस के लिए पल-पल जद्दोजहद कर रहे थे। दो लोग तो 40-40 साल के ही थे।

आईसीयू में काम कर रहे कर्मचारियों की निगाह मरीजों के पास लगे मॉनिटर पर लगातार टिकी हुई थीं। मरीजों की तीमारदारी के लिए एक-एक परिजनों को रहने की छूट थी। हर कोई एक दूसरे को संबल देते और कदम-कदम पर मदद करते दिखे। हर किसी की जुबान पर एक ही प्रार्थना है..ईश्वर सभी को ठीक करें।

घूमते-घूमते मैं 78 साल की रोहिणी के बेड के पास पहुंचा। रोहिणी पांच दिन से आईसीयू में हैं और उनकी हालत गंभीर है। डॉ. नीलू उन्हें संभाल रही हैं। डॉ. रीमा और डॉ. नीलू लगभग हर सात से आठ मिनट में भर्ती मरीज के पास जाती हैं और संभालती हैं। इसी दौरान राउंड पर डॉक्टर पहुंचे। मरीजों के चेहरे पर थोड़ी उत्सुकता दिखी।

दिन-रात मरीजों को देखते हैं और कहते हैं…पहले से सुधार है तो परिजनों के चेहरे पर थोड़ा सुकून सा दिखा। फिर डॉक्टर पहुंचे 65 साल के महावीर के पास। रिपोर्ट और नब्ज देखकर उनके माथे पर थोड़ी सी चिंता दिखती है। परिजनों ने पूछा तो कहा…अभी कुछ नहीं कहा जा सकता है। थोड़ा इंतजार करना होगा। वे तुरंत ही अगले मरीज के पास जाते हैं और वहां उन्हें कुछ राहत महसूस होती है।

वे परिजनों से भी बात करते हैं। चूंकि राउंड काफी महत्वपूर्ण होता है और मरीजों की पिछले 12 घंटे की पूरी डिटेल के अनुसार सीनियर डॉक्टर आगे का इलाज तय करते हैं।

मॉनिटर की लाइन नहीं, लोगों की जिंदगी है
आईसीयू के अंदर एक बड़े कम्प्यूटर की स्क्रीन पर सभी मरीजों के वेंटिलेटर का रिकॉर्ड लाइव चल रहा था। बीपी, पल्स…हार्टबीट और ऑक्सीजन वगैरह..वगैरह। यहीं से एक ही सिस्टम पर वार्ड के 16 बेड की मॉनिटरिंग हो रही है। इसे मॉनिटरिंग नर्सिंग स्टाफ देख रहा था। यहां चल रही हरी, नीली और पीली लाइनों पर ही जिंदगी टिकी है।

स्टाफ का कहना है कि ड्यूटी पर आने से पहले बस यही दुआ होती है कि किसी की लाइन सपाट नहीं हो। लेकिन हर रोज ऐसा संभव नहीं होेता। खुशी की बात यह कि इस दिन एक भी लाइन सपाट नहीं हुई।

उम्मीदों के साथ मास्क और ऑक्सीजन के इर्द-गिर्द घूम रही जिंदगी

पीपीई किट पहनने के दौरान मुझे एक स्टाफ ने कहा कि – किट क्यों पहन रहे हो? मैंने कहा- सेफ्टी के लिए तो उन्होंने कहा इससे आप अनकंफर्ट रहोगे। लेकिन एक अनजाने डर की वजह से मैंने इसे पहनना ही ठीक समझा। पीपीई किट पहनने के महज दो मिनट में समझ आया आखिर अब स्टाफ यह क्यों पहनना पसंद नहीं करता। दो मिनट के अंदर ही शरीर पसीने से तरबतर हो गया जबकि आईसीयू में एयरकंडीशनर चल रहे थे।

अभी आईसीयू बेड की क्या स्थिति
एसएमएस 145 आईसीयू बेड हैं और सभी भरे हैं।
आरयूएचएस – आईसीयू में 205 बेड भरे हैं। वेंटीलेटर में यह मुख्य तौर पर देखा जाता है
हार्ट रेट 70 से 90
ब्लड प्रेशर 140- 80
सेचुरेशन 93 से कम नहीं। ईसीजी -एमआई वाले लक्षण
आईसीयू की सक्सेस रेट 50 से 60 प्रतिशत तक और वेंटीलेटर पर मरीजों को बचाना मुश्किल।

…और मरीज की मुस्कुराहट से ही डॉक्टरों को मिली नई ताकत
मैं 2 बजे एसएमएस से निकला और पौने तीन बजे तक आरयूएचएस पहुंचा। आईसीयू में डॉ. तरुण लाल, डॉ. अजीत और उनकी टीम राउंड पर थी। आईसीयू में भर्ती सभी लोगों की उम्र 50 से अधिक ही थी। डॉक्टर्स टीम 58 साल की योगिता के पास पहंुची। हालत क्रिटिकल थी। नर्सिंग स्टाफ से पूरा फीडबैक लिया गया। फिर कुछ दवाइयां बदली गईं।

राउंड करती हुई टीम जैसे ही 77 साल के योगेन्द्र के पास पहुंची, वे हाथ जोड़ते हुए मुस्करा उठे। हालांकि उनकी तबीयत बहुत अधिक सही नहीं थी लेकिन डॉक्टर्स को देखते ही जैसे मुस्कुराए, मानो डॉक्टर्स को भी एक बड़ी राहत मिली। डाॅ. तरुण बोले- अरे, आपकी मुस्कुराहट देखकर तो हमें भी एनर्जी मिल गई। सभी को हौंसला रखना होगा और इसी तरह इस से लड़ना होगा।

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