Tuesday, June 15, 2021

Haryana Coronavirus Exclusive Ground Report; Manohar Lal Khattar | Villager Expectations End from Government | सरकार से उम्मीदें खत्म, बुखार बताने में भी शर्मिंदगी; लोग सोचते हैं कि अस्पताल गए मतलब पोटली में बंधकर लौटेंगे

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हिसार में कोरोना के असल आंकड़ों में सरकार पिछड़ती नजर आती है। यहां के गांवों में इतने मरीज हैं कि अगर इनकी सही गिनती करने लगें तो गांवों की 40 फीसदी से ज्यादा आबादी कोरोना संक्रमित नजर आएगी, लेकिन न तो पूरी तरह से सैंपलिंग हो रही है और ना ही कोरोना मरीजों की ट्रेसिंग। 303 गांवों वाले हिसार जिले में अब ब्लैक फंगस भी तेजी से बढ़ रहा है।

उधर, कोरोना पॉजीटिव मामलों में सोनीपत जिला प्रदेश में चौथे नंबर पर है। 13 मई तक सरकारी रिकॉर्ड में मौत के आंकड़े 180 पर हैं, लेकिन गांव के हालात चिंता पैदा कर रहे हैं। एक-एक गांव में 20 दिनों में 18 से 20 मौतें हुई हैं। पढ़ें हिसार और सोनीपत के गांवों से ग्राउंड रिपोर्ट…

1. लोगों में डर, कोरोना बताया तो हो जाएगा सोशल बायकॉट
– हिसार से रत्न पंवार और सुरेंद्र भारद्वाज की रिपोर्ट

सरकार का टेस्टिंग, ट्रेसिंग और ट्रीटमेंट का थ्री टी फॉर्मूला हिसार के गांवों तक आते-आते फेल हो जाता है। असल में यहां के लोग कोरोना बीमारी बताने में शर्मिंदगी महसूस करने लगते हैं। गांवों की हकीकत है कि कोरोना के मरीज मतलब सामाजिक बहिष्कार। यहां के लोग गुपचुप इलाज करवा रहे हें और घर में रहकर ही ऑक्सीजन सिलेंडर तक लगवा ले रहे हैं।

अब तो स्थिति यह है कि गांवों में ऑक्सीजन ब्लैक में पहुंच रही है। बिना डॉक्टर की निगरानी में मेडिकल ऑक्सीजन लगाना मना है, लेकिन मजाल है कि लोग डॉक्टर के पास चले जाएं। इसका एक बड़ा कारण गांवों में फैली अफवाह है कि अस्पताल गए, मतलब पोटली में बंधकर ही वापस लौटेंगे। इसी डर ने अब ग्रामीणों को सेल्फमेड डॉक्टर बना दिया है।

ग्रामीणों ने अपनाया नया पैटर्न
ग्रामीण घर में गंभीर मरीजों के इलाज की जुगाड़ करने में लगे हैं, वह भी गुपचुप तरीके से। ग्रामीणों ने अब तो नया पैटर्न अपना लिया है कि जो मरीज कोरोना से ठीक हो चुके हैं, उनसे दवाइयां पूछ लेते हैं और मेडिकल स्टोर से खरीदकर अपना इलाज कर लेते हैं। हालात ये हैं कि अब ग्रामीण बुखार बताने में भी शर्मिंदगी महसूस कर रहे हैं।

टेस्टिंग करवाने के लिए शहर के अस्पताल में जाना पड़ता है। गलती से गांव में टेस्टिंग की टीम आ भी जाए तो ग्रामीण आगे नहीं आते ताकि किसी पड़ोसी को पॉजिटिव होने की सूचना ना मिल जाए। यहां के ग्रामीणों का कहना है कि सरकार के सेहत महकमे से विश्वास डगमगा रहा है।

यहां अब वोट नहीं, सामाजिक जिम्मेदारी अहम
गांवों की पढ़ी-लिखी पंचायतों से पावर छीन जाने के बाद वे स्वयं ही जनसेवा में उतर आए हैं। अब प्रतिनिधियों के चेहरे पर वोट का लालच नजर नहीं आता। सामाजिक जिम्मेदारी के लिए एकजुट हो रहे हैं। सरकारी तंत्र के इंतजामों की राह देखते-देखते इनकी आंखों ने अब इंतजार करना ही बंद कर दिया है। प्रतिनिधि अब अपने ही स्तर पर हेल्थ सिस्टम को संभालने में जुट गए हैं।

बिचपड़ी में बना आइसोलेशन वार्ड, महिलाओं ने तोड़े बेड, फेंके गद्दे
गांव बिचपड़ी में लोगों में कोरोना का डर इतना बना है कि यहां के लोगों ने आइसोलेशन वार्ड भी नहीं बनने दिया। सरकार की ओर से गांव के राजकीय कन्या स्कूल में आइसोलेशन वार्ड के लिए बेड लगा दिए थे, लेकिन ग्रामीणों में अफवाह फैल गई कि इस आइसोलेशन वार्ड में दूसरे गांव के मरीज भी आ जाएंगे और गांव में संक्रमण तेजी से फैल जाएगा। इसलिए गुरुवार दोपहर को गांव की करीब 50 महिलाएं स्कूल में पहुंचीं और यहां पर आइसोलेशन सेंटर में बिछे हुए बेड पलट दिए और गद्दे फेंक दिए।

कोरोना से इनकार
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बाडो पट्‌टी टोल प्लाजा पर ना तो कोरोना का कोई असर नजर आता है और ना ही किसान कोरोना वायरस का वजूद मानते हैं। पूरी तरह से कोरोना से बेखौफ यहां पर हर उस मानक को किसानों ने किनारे कर दिया है, जो बताते हैं कि कोरोना इन कारणों से फैल सकता है। टोल प्लाजा पर एक साथ करीब 6 से 7 लोग हुक्का गुडगुड़ा रहे हैं। स्टील के गिलास में खीर डालकर चम्मच से चटकारे लिए जा रहे हैं। किसान आंदोलन को लेकर 40 से 50 लोगों की आपस में रोजाना बैठकें भी होती हैं, लेकिन मजाल है किसी को कोरोना हो जाए।

कोरोना-वोरोना कुछ कोनी
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गांव सिवानी गोलान के 70 वर्षीय बुजुर्ग किसान चांदीराम कहते हैं, ‘यो कोरोना सरकार की फैलाई ओड बीमारी है। कोरोना-वोरोना कुछ कोनी। या तो माच्छरां के कारण मलेरिया और डेंगू फैल रहा है। सरकार अगर कोरोना को खत्म करना चाहती है तो मच्छरों को मार दें, कोरोना भी मर जागा।’ टोल प्लाजा पर पिछले करीब पांच महीने से लगातार आ रहे हैं। ना तो आजतक वैक्सीन लगवाई और ना ही सैंपलिंग करवाई और कोरोना भी नहीं हुआ। रोजाना आते हैं, सरकार को कृषि कानूनों के लिए कोसकर चले जाते हैं।

अस्पतालों की लूट से तंग आकर खुद बनाया आइसोलेशन वार्ड
पंचायत तलवंडी राणा के सरपंच प्रतिनिधि एडवोकेट ओमप्रकाश कोहली कहते हैं कि गांव की 10 हजार आबादी है और आज की तारीख में करीब 500 युवा बच्चे और बुजुर्ग कोरोना से संक्रमित हैं। ये सभी घरों में ही छिपे हुए हैं, जो अपना चेकअप भी नहीं करवाना चाहते। परसों कोरोना टीम आई, लेकिन घर से बुलाने के बाद भी बमुश्किल 40 लोगों ने ही कोरोना का टेस्ट करवाया। इसमें से 5 केस पॉजिटव आए। युवा प्राइवेट अस्पतालों से चेकअप करवाकर आते हैं, ताकि किसी को पता ही ना चले कि कोरोना भी हुआ है।

जेब खर्च से दवा लाए, बिछाए 20 बेड
तलवंडी राणा में सरकारी सिस्टम से विश्वास उठने के बाद अब गांव के सरपंच प्रतिनिधि ओमप्रकाश कोहली कहते हैं कि गांव में अब तक स्वास्थ्य सेवाएं ठीक नहीं हैं तो ऐसे में अपनी जेब खर्च से ही 50 हजार रुपए की ग्लूकोज, इंजेक्शन, ऑक्सीजन के मास्क और दवाएं लेकर आए हैं। गांव की गुर्जर धर्मशाला में 20 बेड का आइसोलेशन वार्ड भी बनाया है। ​​​​​​​

पाबंदियों के बावजूद मलिकपुर गांव में सगाई जैसे समारोह हो रहे हैं।

कोहली कहते हैं कि बेड और दवा की व्यवस्था तो हमने कर ली, कम से कम अब सरकार एक डॉक्टर ही मुहैया करवा दे। यहां बरगद व पीपल के पेड़ के नीचे मरीजों का योगा भी शुरू करवा देंगे, ताकि ऑक्सीजन की कमी भी पूरी हो जाए।

2. दिल्ली बॉर्डर के साथ लगते गांवों में कोरोना का कहर
-सोनीपत से जितेंद्र बूरा और सुभाष राय की रिपोर्ट

दिल्ली बॉर्डर से लगते घनी आबादी वाले गांवों में कोरोना कहर बरपा रहा है। बॉर्डर के नजदीक हरियाण के विख्यात कवि पंडित लख्मी चंद के गांव जाटी कलां में ही पिछले 20 दिनों में 18 मौत हुई हैं। ज्यादातर को बुखार आया था।

यहां के गांव में भी भय का माहौल है। गांव सेरसा, थाना कलां, सिसाना, खानपुर कलां, बड़ी, नाहरी सहित कई गांवों की स्थिति लगभग एक सी है। Newsline टीम ने गांवों में पहुंचकर हालात जाने तो स्वास्थ्य सुविधाओं से लेकर मॉनीटरिंग, टेस्टिंग का अभाव दिखा। कोरोना के पहले दौर में मोबाइल टीम ने जांच की थी। इस बार कोई टीम नहीं पहुंची तो लोग भी अस्पताल जाने से डरते हैं। वैक्सीनेशन कैम्प जरूर लगे हैं, लेकिन कई गांवों में दूसरी डोज का इंतजार है।

बिना मास्क लगाए भवन निर्माण के मजदूरों के लिए चाय ले जा रहे सतबीर ने बताया कि गांव में बीमारी फैली है। मौतें भी हुई हैं। जिनकी हालत ज्यादा बिगड़ी, वे ही टेस्ट करवाने सोनीपत गए। अस्पताल में रखने का डर है, इसलिए मेडिकल स्टोर और गांव के झोलाछाप डॉक्टर से दवाइयां लेते रहे। गांव में एक व्यक्ति की पुरानी बीमारी से मौत हुई, लेकिन 10 से 15 दिन बाद दिल्ली में नर्स रही उसकी पत्नी की भी मौत हो गई।

सिसाना गांव में 20 से ज्यादा मौतें हुई
सिसाना गांव में एक महीने में 20 से ज्यादा मौतें हुई हैं। गांव में बुखार फैला है। दहिया खाप प्रधान सुरेंद्र दहिया सहित उनका परिवार भी कोरोना पॉजिटिव है। वे खुद इलाज करा रहे हैं और पूरे परिवार ने खुद को आइसोलेट कर दिया है। सुरेंद्र दहिया ने कहा कि युवाओं ने जागरूकता के लिए टीमें भी बनाई हैं। टेस्टिंग कैंप भी लगवाए हैं।

अब तक 12 की जान गई, लेकिन आज भी पार्टी कर रहे ग्रामीण
6 हजार की आबादी वाले मलिकपुर गांव में 4 कोरोना पॉजिटिव मरीजों समेत 8 माैतें हो चुकी हैं, लेकिन ग्रामीण आज भी पार्टी कर रहे हैं। Newsline टीम पहुंची तो एक जगह सगाई की पार्टी चल रही थी। ग्रामीण एकजुट होकर खाना खा रहे थे।

सरपंच बबीता ने कहा कि डर भी है, फिर भी लोग नहीं मान रहे हैं। सरपंच ने कहा कि गांव में पहरा भी लगा रहे हैं, लेकिन टेस्टिंग हुई होती तो आज स्थिति अलग होगी।

गांव के लोगों ने अपने खर्च से धर्मशाला में बनाया आइसोलेशन वार्ड।

गांव के लोगों ने अपने खर्च से धर्मशाला में बनाया आइसोलेशन वार्ड।

छोटे गांव ने कोरोना के कहर से खुद को बचाया
भुर्री और राजपुर जैसे छोटे गांव ने कोरोना को मात दे दी। गांव की मुख्य सड़क पर सन्नाटा पसरा हुआ है। असली लॉकडाउन तो यहां जान पड़ता है। आपको जानकर आश्चर्य होगा कि इस कहर में भी गांव में एक भी जान कोरोना की वजह से नहीं गई। भुर्री गांव में 95 साल के एक बुजुर्ग की सामान्य मौत हुई है। गांव के अड्‌डे के पास रहने वाले जोगिंदर और पवन कुमार ने कहा कि लोगों ने खुद को सीमित रखा। सिर्फ 2 हजार आबादी है।

गन्नौर गांव का एक स्कूल, जहां आइसोलेशन वार्ड के लिए चारपाई लाई गई हैं।

गन्नौर गांव का एक स्कूल, जहां आइसोलेशन वार्ड के लिए चारपाई लाई गई हैं।

वहीं, राजपुर निवासी प्रवीण राठी ने कहा कि उनके गांव की आबादी 5 हजार है, लेकिन कोरोना का कोई कहर नहीं। उधर, गन्नौर के कई स्कूलों में आइसोलेशन वार्ड बनाए जा रहे हैं। यह प्रयास पहले हुआ होता तो शायद बहुत सी जिंदगी बच जाती।

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