Tuesday, June 22, 2021

Coronavirus Second wave; Bihar News | Dainik Bhaskar Ground Report From Gaya Khagaria Village | ऐसा गांव जो पहली और दूसरी लहर में भी कोरोना से बचा हुआ है, यहां जो भी बाहर से आता है, उसके लिए 14 दिन क्वारैंटाइन का नियम

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बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी के विधानसभा क्षेत्र के कुछ गांवों में न तो लॉकडाउन नजर आता है, न लोग कोरोना प्रोटोकॉल का पालन करते हुए दिखते हैं। हालांकि, राज्य के हर गांव में ऐसे हालात नहीं हैं। खगड़िया के गांवों में अनुशासन नजर आता है। कुछ गांव ऐसे भी हैं, जो पहली के बाद दूसरी लहर में भी कोरोना से बचे हुए हैं। पढ़ें, बिहार के गांवों से ग्राउंड रिपोर्ट…

1. जागरुकता और अनुशासन ने इन गांवों को कोराेना से बचाया
खगड़िया से मुरली दीक्षित और प्रभांशु रंजन की रिपोर्ट

खगड़िया के परबत्ता में चार गांव ऐसे भी हैं, जहां कोरोना अभी तक प्रवेश नहीं कर सका है। आम दिनों की तरह यहां रोजमर्रा की जिंदगी सामान्य है। खुद को बचाने में सबसे बड़ी भूमिका स्थानीय ग्रामीणों की है। ग्रामीणों ने ऐसा नियम बना दिया है कि जो भी बाहर से आएगा, वो एक से दो सप्ताह तक अकेले में रहेगा।

कोरोना जांच के साथ-साथ टीकाकरण में भी लोग बढ़चढ़ कर भाग ले रहे हैं। टीकाकरण को लेकर कोई अफवाह नहीं मिली। कई बुजुर्ग ऐसे भी मिले, जो टीके का दोनों डोज ले चुके हैं। जिले में कोरोना के आठ हजार से ज्यादा केस हैं, लेकिन चौथम के तीन गांव गढ़िया, पहाड़चक, फर्रेह ऐसे हैं, जहां लोगों की जागरुकता ने अभी तक कोरोना को प्रवेश नहीं करने दिया है।

गढ़िया और पहाड़चक की आबादी करीब 2400 जबकि फर्रेह की आबादी 3000 के करीब है। इन तीनों गांवों में सैकड़ों लोग ऐसे भी है जो कोरोना काल में दिल्ली, पंजाब जैसे दूसरे राज्यों से आए, लेकिन इसके बाद भी इन तीनों गांवों ने अभी तक अपने आप को कोरोना से सुरक्षित रखा है।

न पिछले साल कोई मरीज मिला और न ही इस बार
खगड़िया के चौथम प्रंखड के तेलौछ पंचायत के गढ़िया गांव की शिक्षिका अमिता कुमारी बताती हैं कि मेरा बेटा कोटा से आया था। यहां आने पर एक सप्ताह तक हमलोगों ने उसे एक ही कमरे में रहने दिया। खाना उसके गेट पर ही दे दिया जाता था। रविवार को जब Newsline टीम उनके गांव पहुंची तो अमिता अपने पति श्याम कुमार के साथ बाजार जाती मिलीं। बीच रास्ते पर भी उनसे कोरोना को लेकर बातचीत की तो उन्होंने बताया कि हमारे गांव में न तो इस साल कोई कोरोना का केस आया है और न ही पिछले साल कोई मरीज यहां मिला था।

डबल लेयर मास्क लगाए भी दिखे लोग, पब्लिक ट्रांसपोर्ट से दूरी
श्याम ने बताया कि जनप्रतिनिधियों के साथ-साथ गांव के लोग कोरोना को लेकर जागरूक है। यहां बाहर से आने वाले वैसे लोग जिनमें कोई लक्षण हो, उन्हें स्कूल में रखा जाता है। जो सामान्य होते हैं, उन्हें भी एक ही कमरे में रखा जाता है। गांव में प्रवेश से पूर्व एनएच किनारे लोग पेड़ की छांव में ताश खेलते दिखे। जबकि अंदर गांव में महिलाएं व बच्चे सड़क पर मक्का सुखाते मिली। गांव में कई लोग पॉकेट में सैनिटाइजर लेकर घूमते मिले। साथ ही कई ऐसे भी मिले जो डबल लेयर मास्क लगाए थे। बचाव के लिए ऑटो-बस छोड़ कर बाइक से यात्रा करते है।

गढ़िया गांव में लोग कोरोना को लेकर जागरूक हैं। वे पॉकेट में सैनिटाइजर लेकर घूमते हैं, डबल मास्क भी पहनते हैं।

दिल्ली से लौटे तो 14 दिनों तक स्कूल में रहना पड़ा
तेलौछ के पूर्व मुखिया राजीव कुमार सिन्हा ने बताया कि मार्च 2020 में जब कोरोना की शुरुआत हुई थी, तभी से हमलोग एक्टिव हैं। गांव में घूम-घूम कर लोगों को मास्क पहनने को जागरूक करते हैं। यदि कोई बाहर से आता है तो उसे क्वारेंटाइन करते हैं। दिल्ली में रिक्शा चलाने वाले गढ़िया के 48 वर्षीय बिंदेश्वरी तांती ने बताया कि पिछले साल जब हम यहां आए तो 14 दिनों तक स्कूल में थे। इस बार बाप-बेटा दोनों दिल्ली से आए तो एक-एक कमरे में अलग रहे। बाहर से गढ़िया में आने वाले हर व्यक्ति के साथ यही प्रक्रिया होती है।

एक से दो गोली में सर्दी-खांसी की दिक्कत हो जाती दूर
गढ़िया के डॉकटर रूपेश कुमार ने बताया कि सर्दी-खांसी की शिकायत घर-घर से है, लेकिन सभी एक-दो गोली खाते ही फिट हो जाते हैं। गांव के ही बुजुर्ग श्रीबाबू ने बताया कि मैं दोनों टीके ले चुका है। गांव में दो बार टीकाकरण का कैंप लगा था। पहली बार में 190 तो दूसरे बार में 140 लोगों को टीका लगाया गया। गांव में शादी-विवाह में भी बहुत कम लोग बुलाए जाते हैं। कई घर तो ऐसे है जहां बिना मास्क पहने लोगों को अंदर घुसने नहीं दिया जाता है। फर्रेह के अनिल शर्मा, रंजन टाइगर, रुद्रनारायण और पहाड़चक के अर्जुन सिंह, रामखेली सिंह ने बताया कि अनुशासन और जागरुकता के दम पर यहां कोरोना का प्रवेश वर्जित है।

शादी में 20 लोगों की मंजूरी, बारात में आ रहे 11 लोग
खगड़िया के महेशखूंट से सहरसा की ओर जाने वाली एनएच 107 किनारे स्थित मंदिर में बैठे कैथी सरैया गांव के नीरज कुमार और गोविंद कुमार ने बताया कि अभी तक कोरोना हमारे गांव को छू नहीं सका है। आज ही गोरख महतो की बेटी की बारात लखीसराय के सूर्यगढ़ा से आने वाली है। प्रशासन ने बारात में 20 लोगों के शामिल होने का आदेश दिया है। हमलोगों की जागरुकता से बारात पक्ष से 11 लोग ही आ रहे हैं। ठीक सामने एक दरवाजा दिखाते हुए उन लोगों ने बताया कि बीते दिनों वहां एक बुर्जुग की मौत हुई थी। उनका श्राद्धकर्म कल ही हुआ है। उसमें भी मात्र 10 लोग भोज खाते मिले।

2. नक्सल प्रभावित 35 गांवों में न लॉकडाउन, न कोरोना प्रोटाेकॉल
गया से कमल किशोर विनीत और अभिषेक मिश्र

इस साल अप्रैल की शुरुआत में दिल्ली से मंझौली पहुंचे शंभू साव में कोरोना के लक्षण दिखे। अस्पताल में इलाज के दौरान तीन दिनों में ही उसकी मौत हो गई। इसके बाद दिल्ली से ही गांव पहुंचे गणेश साव की भी कोरोना से जान चली गई। अचानक हुई दो मौतों से पूरे ग्रामीण सकते में आ गए। धीरे-धीरे गांव के लोगों को सर्दी-जुकाम की समस्या होने लगी।

ग्रामीणों की सबसे बड़ी समस्या थी कि वे इलाज कहां कराएं। क्योंकि पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी के विधानसभा क्षेत्र के ग्रामीण लोगों को इलाज कराने के लिए 30 किलोमीटर दूर प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, इमामगंज जाना पड़ता है। इससे बचने के लिए गांव वालों ने ग्रामीण चिकित्सकों से ही इलाज कराना शुरू किया, लेकिन आज भी ग्रामीणों में जागरुकता की कमी चरम पर है।

इसका उदाहरण सलैया गांव के पास देखने को मिला। गांव के बाहर आम के पेड़ के नीचे शादी के मटकोर विधि-विधान में जुटीं महिलाओं की टोली दिखी। किसी ने मास्क नहीं ही लगा रखी थी, फिर दो गज की दूरी की बात कौन करे।

सलैया गांव के बाहर शादी के मटकोर विधि-विधान में जुटीं महिलाओं ने मास्क नहीं पहन रखा है।

सलैया गांव के बाहर शादी के मटकोर विधि-विधान में जुटीं महिलाओं ने मास्क नहीं पहन रखा है।

नक्सली इलाका होने से नहीं पहुंचते हैं स्वास्थ्यकर्मी
मंझौली पंचायत के मुखिया उत्तमदीप कुमार यादव और सलैया पंचायत की मुखिया पूनम देवी ने बताया कि कई बार जिला प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग से अनुरोध किया कि गांव में कैंप लगाकर लोगों की जांच की जाए, लेकिन नक्सली इलाका होने के कारण स्वास्थ्यकर्मी यहां नहीं आना चाहते हैं।

जिन लोगों ने 30 किलोमीटर दूर जाकर पीएचसी में अपनी जांच कराई, उन्होंने तो आइसोलेट होकर और लोगों को संक्रमित होने से बचा लिया, लेकिन जिनकी जांच नहीं हो सकी वे जानकारी के अभाव में एक-दूसरे से मिलते रहे जिससे संक्रमण फैला। वैसे अब तक दोनों पंचायतों के 600-600 लोगों ने कोरोनारोधी टीका लगवाया है। एक बार गांव में कैंप लगवाकर भी ग्रामीणों का टीकाकरण करवाया गया है।

अप्रैल के पहले सप्ताह में स्थिति भयानक थी
सलैया पंचायत के ग्रामीण चिकित्सक अमेंद्र कुमार ने बताया कि अप्रैल में जब गांव के दो लोगों की कोरोना से जान चली गई तब सर्दी-जुकाम से पीड़ित बड़ी संख्या में लोग आते थे। पूरे महीने मरीजों की संख्या बढ़ी रही। अब मई के दूसरे सप्ताह से मरीजों की संख्या में कमी आई है। लोग भी धीरे-धीरे स्वस्थ हो रहे हैं।

एजिथ्रोमाइसिन, विटामीन-सी, पैरासिटामॉल देते थे डॉक्टर
मंझौली के ग्रामीण चिकित्सक कृष्णा प्रसाद ने बताया कि सर्दी-जुकाम और बुखार की शिकायत वाले मरीजों का कोरोना मरीजों की तरह ही इलाज किया। बुखार के लिए पैरासिटामॉल के अलावा सर्दी-खांसी के लिए विटामीन सी की गोलियां, एंटीबायोटिक, जिंक आदि ही मरीजों को देते रहे। इसके साथ ही उन्हें गर्म पानी और काढ़ा पीने के लिए कहते थे। लगातार पांच दिन भांप लेना भी जरूरी बताया।

बारिश होने पर पथरा, हेरहंज और केवलडीह के लोग नहीं जा पाते हैं अस्पताल
झारखंड की सीमा से सटी सलैया पंचायत के पथरा, हेरहंज और केवलडीह गांवों के लोगों के सामने सबसे बड़ी समस्या नदी पार करने की है। गांव के अनिल यादव बताते हैं कि झारखंड के पलामू, चतरा और बिहार के गया जिले से सटे रहने के बाद भी सीमांकन विवाद के कारण मोरहर नदी पर पुल नहीं बन सका है।

इस कारण बरसात के मौसम में इन गांवों के लोगों को परेशानी झेलनी पड़ती है। इन्हें इमामगंज प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र जाने के दौरान तीन बार पैदल ही मोरहर नदी को पार करना पड़ता है। ऐसे में बारिश होते ही नदी में पानी होने पर बीमार लोग गांव में ही दम तोड़ देते हैं।

केवलडीह गांव के प्राथमिक विद्यालय के शिक्षक कृष्णा यादव ने बताया कि गांव से अस्पताल की दूरी बहुत अधिक होने के कारण गांव के लोगों ने यहीं के डॉक्टर से इलाज कराया। गांव वालों ने उन्हीं पर भरोसा जताया।

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