Sunday, May 16, 2021

In Neemgaon, just 150 km from Delhi, the fate of women is tied with water, hair falls on her head, her feet are slipped and many are injured., | दिल्ली से सिर्फ 150 किमी दूर नीमगांव में औरतों की किस्मत पानी की धार से बंधी, सिर पर पानी ढोते-ढोते बाल झड़े, गिरकर घायल होना रोज की बात

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नीमगांव के रास्ते और पगडंडियों पर यहां की औरतों के पैरों की अमिट छाप है। दो साल की मासूम, सात साल की बच्ची, चौदह साल की किशोरी, इक्कीस बरस की युवती, तीस-पैंतीस की महिला, पचास-पचपन की अधेड़ या सत्तर-अस्सी की बुज़ुर्ग। यहां औरत की उम्र बदलती है, संघर्ष वही रहता है।

तेज भागता बचपन, अठखेलियां करता यौवन, कांपता बुढ़ापा, यहां सभी पानी भरने की दौड़ में शामिल हैं। कई बार पैर फिसलते हैं तो उम्र भर का दर्द मिलता है, चक्कर खाकर गिरती हैं तो होश आते ही फिर पानी का मटका उठाना पड़ता है।

देश की राजधानी दिल्ली से 150 और उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से करीब साढ़े चार सौ किलोमीटर दूर मथुरा का नीमगांव महिलाओं के संघर्ष का स्मारक है। मीठे पानी की बूंद-बूंद को तरसते इस गांव की महिलाओं की जिंदगी पानी भरने से शुरू होकर पानी भरने पर ही खत्म हो जाती है।

चांद पर यान भेजने और फाइटर जैट में बेटियों को बिठा देने वाले 21वीं सदी के भारत का ये गांव कहीं पीछे छूट गया लगता है। आबादी के लिहाज से ये किसी छोटे कस्बे जैसा है। यहां रहने वाले करीब साढ़े सात हजार लोग पीने के पानी के लिए गांव के इर्द-गिर्द लगे चार-पांच मीठे पानी के नलों पर ही निर्भर हैं।

सुबह हो या शाम या तपती दोपहर, यहां की पगडंडियों पर सिर पर मटका लिए तेज कदम चलती औरतों की कतारें नजर आती हैं। पांच साल की ज्योति दस लीटर की कैन में पानी ले जा रही है, लेकिन उसका कमजोर शरीर भार नहीं उठा पा रहा है। दो बार उसकी कैन हाथ से छूटी और पानी बिखर गया। आंख से आंसू तो निकले लेकिन उसने हिम्मत नहीं हारी। वो तीसरी बार फिर नल की तरफ चल दी, क्योंकि प्यास बुझाने के लिए घर में पानी होना जरूरी है।

रोज गांव के बाहर से पानी लाना 13 साल की सोनाली की जिम्मेदारी है।

छह माह की गर्भवती नीलेश दो बर्तन थामे धीमे कदमों से नल की तरफ बढ़ रही हैं। वो इस गांव की बहू हैं और अब यहां ब्याह देने की वजह से अपने परिजनों से नाराज हैं। दिल्ली की रहने वाली नीलेश ने कभी पानी नहीं भरा था। वो कहती हैं, ‘एक दिन दोपहर में मैं पानी भरने आई तो बेहोश हो गई। गांव के लोगों ने मुझे उठाकर घर पहुंचाया।’

नीलेश कहती हैं, ‘जब मैंने अपने मम्मी-पापा से कहा कि मुझसे पानी भरने नहीं जाया जा रहा है तो उन्होंने कहा जैसे गांव की बाकी सभी औरतें भरती हैं, तुझे भी वैसे ही आदत पड़ जाएगी।’

नीलेश को पेट में पल रहे बच्चे की फिक्र है। वो कहती हैं, ‘मुझे अपने बच्चे के लिए डर लगता है कि किसी दिन पैर फिसलकर गिर गई तो क्या होगा। पूरा शरीर दुखता है। मुझसे पानी भरने आया नहीं जाता, लेकिन आना पड़ता है।’ नीलेश के पति ऑटो चलाते हैं। वो कहती हैं, ‘मैंने उनसे दिल्ली चलने के लिए कहा लेकिन नहीं माने। वो पानी भरने भी नहीं आते। कहते हैं मैं पानी भरूंगा तो घर चलाने के लिए कमाएगा कौन?’

एक पुराने बड़े घर के बाहर दीवार पर बैठी बुजुर्ग लीला पानी भरने के लिए दौड़ रही औरतों को देखकर हंस देती हैं। लीला को अपनी उम्र का पता नहीं, लेकिन उनके शरीर की झुर्रिया बताती हैं कि वो अस्सी से ज्यादा साल की होंगी।

जब लीला इस गांव में ब्याह कर आई थीं पानी भरना और भी चुनौतीपूर्ण था। तब कुआं मीलों दूर था। लीला याद करती हैं, ‘बूढ़ी हो गई पानी भरते-भरते, बड़े-बड़े लहंगे पहनकर पानी लाते थे। रास्ते में कीचड़ होती थी तो गिर जाते थे। न पीने को पानी था, न नहाने को। आधी रात को चलना पड़ता था, जब आंख खुलती पानी भरने चल देती थी। पहले तो कई कोस दूर जाना पड़ता था, अब इनके भागन से खारे-मारे नल लग गए, हमारे भाग में तो नल भी न थे।’

एकसाथ दो बर्तन में पानी ढोकर ले जाती 10 साल की मीनू।

एकसाथ दो बर्तन में पानी ढोकर ले जाती 10 साल की मीनू।

गांव की हर औरत का अपना दर्द है। शारदा कहती हैं, ‘चौमासे में पानी भरने आई थी। कीचड़ में पैर फिसलने से गिर गई। कमर टूट गई थी। एक दिन में तीन-तीन बार पानी भरने आना पड़ता है। मर्दों से मुंह छुपाना पड़ता है। जल्दी के चक्कर में फिसलकर गिर जाती हैं।’

यहां नल पर पहले पानी भरने को लेकर कई बार औरतों में लड़ाई भी हो जाती है। शारदा कहती हैं, ‘सूरज नहीं निकलता, हम घर से निकल देती हैं, देर हो जाती है तो नल पर भीड़ मिलती है। लड़ाई होती है तो मुंह फूट जाते हैं।’

निशा की शादी को दस साल हो चुके हैं। उन्हें अब पानी भरने की आदत पड़ गई है, लेकिन वो चाहती हैं कि उनकी बेटी को आगे पानी न भरना पड़े। वो कहती हैं, ‘सारा दिन पानी भरने में निकल जाता है। और किसी काम के लिए टाइम ही नहीं बचता। पानी के बिना कुछ है भी नहीं। पीने के लिए ताजा पानी चाहिए होता है, लेकिन इस ताजा पानी को भरने में हमारी जान निकल जाती है।’

गांव की एक औरत अपना सर दिखाते हुए कहती है, ‘इस गांव की औरतें पानी भर भरकर गंजी हो रही हैं। शरीर सूख रहे हैं। जवान औरतें बूढ़ी लगने लगी हैं।’

गांव के ही सोनू टैंकर से पानी सप्लाई करने का काम करते हैं। सोनू एक टैंकर पानी ढाई सौ से तीन सौ रुपए में देते हैं। ये पानी घर की जरूरतों के लिए पंद्रह दिन तक के लिए काफी होता है। यदि इस लिहाज से देखा जाए तो ये इतना महंगा भी नहीं है।

लेकिन गांव में अधिकतर लोग गरीब हैं जो पैसे की किल्लत की वजह से स्टोरेज नहीं बनवा पाते हैं। एक महिला कहती है, ‘यहां औरत की पंद्रह दिन पानी भरने की मेहनत तीन सौ रुपए के बराबर है। औरतें हड्डियां तोड़ रही हैं लेकिन उसका कोई मोल नहीं है।’

महिलाएं और बच्चियां गांव से करीब एक किमी दूर इस हैंडपंप से पानी लाने को मजबूर हैं।

महिलाएं और बच्चियां गांव से करीब एक किमी दूर इस हैंडपंप से पानी लाने को मजबूर हैं।

जमना 75 साल की हैं। उन्हें अब भी पानी भरने आना पड़ता है। वो बमुश्किल एक कैन पानी ही ले जा पाती हैं। वो कहती हैं, ‘मुझसे चला नहीं जाता, मुझ बूढ़ी को कोई पूछने वाला नहीं है। अब तो पानी भरने से पीछा मरकर ही छूटेगा।’

योगेंद्र पांच साल पहले गांव में पानी की टंकी लगवाने के वादे के साथ प्रधान बने थे। अब उनका कार्यकाल समाप्त होने को है, लेकिन वो पानी की टंकी नहीं लगवा सके हैं।

योगेंद्र कहते हैं, ‘सर्वे के बाद बोरिंग तो हो गया है, उम्मीद है अगले छह-सात महीने में घर-घर टंकी का पानी भी पहुंच जाएगा।’ योगेंद्र अपनी बात पूरी करते ही हैं कि ग्रामीण बोल पड़ते हैं, ‘आजादी के बाद से इस गांव में पानी आ रहा है, अब तक तो आया नहीं है। हर बार नेता आते हैं, नारियल फोड़ते हैं और फिर नीमगांव को भूल जाते हैं।’

गांव के ही एक युवा विकास राजपूत कहते हैं, ‘मैंने जन्म से देखा है, और हमारे जन्म से पहले भी यहां की औरतें पानी की समस्या से जूझती रही हैं। हमारी औरतें ऐसी समस्या से जूझ रही हैं जिसे सुलझाया जा सकता है। बेटियां इसकी वजह से पढ़ नहीं पा रही हैं। औरतों का स्वास्थ्य खराब हो रहा है। हमें आश्वासन तो मिलते रहे हैं लेकिन अभी तक पूरा समाधान नहीं हुआ है।’

विकास कहते हैं, ‘गांव में जब तक टंकी का पानी घर-घर नहीं पहुंचेगा ये गांव आगे नहीं बढ़ेगा। हम आशा करते हैं कि सरकार इस तरफ ध्यान देगी।’

गांव की औरतें कैमरे को उम्मीद की नजर से देखती हैं। वो हाथ जोड़कर कहती हैं कि कोई उनकी सुन ले और गांव में पानी पहुंचा दे। जमना कहती हैं, ‘ले गए फोटो खींचके, नाम पता सब लिखा, लेकिन हुआ कुछ नहीं। कोई सुनने वाला नहीं है।’

ये कहते-कहते वो कदम घसीटते हुए गांव की तरफ बढ़ जाती हैं। दूसरी तरफ से दो साल की पिंकी हाथ में बोतल लिए अपनी मां के साथ नल की तरफ बढ़ी जा रही है।

ऐसा लगता है मानों नीमगांव की औरतों की किस्मत को किसी ने पानी से बांध दिया है। वो इस कैद से आजाद होने के लिए तड़प रही हैं, लेकिन आजादी के 75 साल बाद भी अभी उनकी सुध लेने वाला कोई नहीं है।

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